“उत्तर प्रदेश सरकार ने 2025 में महिलाओं की सुरक्षा के लिए शहरों में व्यापक CCTV नेटवर्क स्थापित करने की योजना शुरू की है। लखनऊ, कानपुर, और नोएडा जैसे शहरों में हाई-रेजोल्यूशन कैमरे और AI तकनीक का उपयोग होगा। लेकिन क्या यह निगरानी वास्तव में महिलाओं को सुरक्षित रख पाएगी, या यह गोपनीयता पर सवाल उठाएगी?”
यूपी में महिलाओं की सुरक्षा: नया CCTV नेटवर्क कितना प्रभावी?
उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों ने सरकार को त्वरित कार्रवाई के लिए मजबूर किया है। 2025 में, यूपी सरकार ने राज्य के प्रमुख शहरों—लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, और नोएडा—में 50,000 से अधिक हाई-रेजोल्यूशन CCTV कैमरे स्थापित करने की योजना शुरू की है। यह पहल Nirbhaya Fund के तहत ₹1,500 करोड़ के बजट के साथ लागू की जा रही है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
लखनऊ में 10,000 कैमरे, कानपुर में 8,000, और नोएडा में 5,000 कैमरे लगाए जाएंगे, जो AI-आधारित फेशियल रिकग्निशन और गति विश्लेषण (gait analysis) जैसी तकनीकों से लैस होंगे। गौतम बुद्ध नगर पुलिस ने पहले ही 337 संवेदनशील स्थानों की पहचान की है, जैसे सेक्टर 18 मार्केट, हरोला मार्केट, और मेट्रो स्टेशन। यह नेटवर्क रियल-टाइम मॉनिटरिंग और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए कंट्रोल रूम से जुड़ा होगा।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि CCTV नेटवर्क अपराध रोकने में सीमित प्रभाव डालते हैं। दिल्ली में 2010-2018 के बीच लगाए गए 5,000 कैमरों का उपयोग मुख्य रूप से जांच के लिए हुआ, न कि अपराध रोकथाम के लिए। एक अध्ययन के अनुसार, केवल 60% कैमरे ही कार्यात्मक थे, और उनमें से आधे की मॉनिटरिंग नहीं हो रही थी। नोएडा की डिप्टी कमिश्नर (महिला सुरक्षा) वृंदा शुक्ला ने बताया कि नया सिस्टम इस कमी को दूर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसमें 24×7 मॉनिटरिंग और त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया शामिल है।
गोपनीयता एक बड़ा मुद्दा है। Big Brother Watch जैसे संगठनों ने चेतावनी दी है कि व्यापक निगरानी महिलाओं की निजता को खतरे में डाल सकती है। दिल्ली में 2021 में 1,826 कैमरे प्रति वर्ग मील की दर से निगरानी के बावजूद, महिलाओं ने इसे “नजरबंदी” जैसा बताया। यूपी में हाल ही में गोरखपुर के एक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में बाथरूम में कैमरे लगने की घटना ने इस चिंता को और बढ़ाया।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए अन्य उपाय भी किए जा रहे हैं। नोएडा में महिला पुलिस बूथ और “पिंक टॉयलेट” की स्थापना की योजना है। लखनऊ में “Ask for Angela” जैसे अभियान को फिर से शुरू किया जाएगा, जिसके तहत महिलाएं खतरे में कोडवर्ड का उपयोग कर मदद मांग सकती हैं। इसके अलावा, Karnataka के मुफ्त बस योजना जैसे मॉडल को यूपी में लागू करने की चर्चा है, जो महिलाओं की गतिशीलता और सुरक्षा को बढ़ावा दे सकती है।
लेकिन क्या यह पर्याप्त है? विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक अकेले समाधान नहीं है। Safetipin की प्रोग्राम हेड सोनाली व्यास ने बताया कि बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग, सुरक्षित लास्ट-माइल कनेक्टिविटी, और संवेदनशील पुलिस प्रतिक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है। 2024 में दिल्ली में हुए एक सर्वे में केवल 6% महिलाओं ने शहर को सुरक्षित बताया, जिससे साफ है कि निगरानी के बावजूद महिलाएं सतर्क रहने को मजबूर हैं।
यूपी सरकार का दावा है कि यह नेटवर्क 2025 के अंत तक पूरी तरह कार्यात्मक होगा, लेकिन इसके प्रभाव को मापने के लिए पारदर्शी मूल्यांकन और डेटा गोपनीयता नियमों की आवश्यकता होगी। बिना सामाजिक जागरूकता और लैंगिक संवेदनशीलता के, यह तकनीक केवल सतही उपाय साबित हो सकती है।
Disclaimer: यह लेख हाल के समाचारों, रिपोर्ट्स, और विशेषज्ञ विश्लेषण पर आधारित है। डेटा और घटनाएं विश्वसनीय स्रोतों से ली गई हैं, लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय अधिकारियों से नवीनतम अपडेट्स की पुष्टि करें।